ज्योतिष में गणना का सबसे बड़ा रूप राशि के रूप में पाया जाता है।जन्म समय और स्थान के हिसाब से छितिज पर उदित राशि को लग्न के रूप में लिया जाता है।
(1) जब क्रमबध रूप से जातक के बारे में अध्ययन किया जाता है तो इसी लग्न को प्रधानता दी जाती है।और इसी के स्वामी को लग्नेश बोला जाता है।
(2)) इस राशि (30 डिग्री) के आधे भाग का ही नाम होरा बोला जाता है।लग्न के बाद इसी का रूप सबसे बड़ा यानि आधा रूप आप सब लोग देख सकते है। ओर धन,चल ओर अचल संपत्ति का अध्यन इसी के आधार पर किया जाता है।
(3) तीसरे सबसे बडे भाग को द्रेष्कोंण बोला जाता है,एक राशि के तीन भाग करने पर ये 10 डिग्री का एक भाग होता है,इसके द्वारा ही भाई बहन,पराक्रम,पड़ोसी, यात्रा, ससुर के बारे में अध्ययन किया जाता है।
राशि के पहले भाग(10 डिग्री) को कर्म ,दुषरे भाग (20डिग्री) भोग और तीसरे भाग (30डिग्री) को विनाश की संज्ञा दी जाती है।
कमाल तो गुरु के आशीर्वाद का होता है कि वो एक ही सिद्धान्त से अनंत फलादेश निकालने की विधि बता देते है।
बाकी तो भगवान श्री गणेश की कृपा पर निर्भर करता है कि वो आपको कैसे आगे के मार्ग पर ले जाये और बुद्धि ,विवेक के द्वारा अज्ञात को ज्ञात करने का मार्ग प्रशस्त करे।
रिसर्च ही जीवन है।
जय श्री गणेश।
जय गुरुदेव।